कबीर दास के दोहे ओर अर्थ | कबीर के दोहे हिन्दी | कबीर दास की अमृतवानी | Kabir Das Ke Dohe In Hindi | Kabir Das Ji Ke Dohe | Kabir Ke Dohe With Meaning In Hindi Language - allabouthindi

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Friday, March 20, 2020

कबीर दास के दोहे ओर अर्थ | कबीर के दोहे हिन्दी | कबीर दास की अमृतवानी | Kabir Das Ke Dohe In Hindi | Kabir Das Ji Ke Dohe | Kabir Ke Dohe With Meaning In Hindi Language


कबीर दास के दोहे ओर अर्थ | कबीर के दोहे हिन्दी | कबीर दास की अमृतवानी | Kabir Das Ke Dohe In Hindi | Kabir Das Ji Ke Dohe | Kabir Ke Dohe With Meaning In Hindi Language



संत कबीर दास का जीवन परिचय हिंदी में | sant kabir das biography in hindi
  • नाम -  कबीर दास
  • उपाधि - संत
  • जन्म स्थान व शताब्दी - 15 वी शताब्दीसंवत् 1455, रामतारा (काशी)
  • विशेष - ज्ञानआश्रय शाखा के प्रतिनिधि कवि
  • साहित्य कार्य - भक्ति आंदोलन व प्रगतिशील लेखक आंदोलन में भाग लेना
  • मुख्य रचनाएं - साखी ,सबद ,रमैनी
  • मृत्यु - संवत 1551, मगहर


Kabir Das Ke Dohe In Hindi


{1}
मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ॥
kabir das ke dohe in hindi
जीवन में जय पराजय केवल मन की भावनाएं हैं.यदि मनुष्य मन में हार गया निराश हो गया तो  पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है. ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?

kabir das ke dohe


{2}
जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तरवार को पडा रहन दो म्यान ॥
kabir das ke dohe
सच्चा साधु सब प्रकार के भेदभावों से ऊपर उठ जाता है. उससे यह न पूछो की वह किस जाति का है साधु कितना ज्ञानी है यह जानना महत्वपूर्ण है. साधु की जाति म्यान के समान है और उसका ज्ञान तलवार की धार के समान है. तलवार की धार ही उसका मूल्य है उसकी म्यान तलवार के मूल्य को नहीं बढाती.

kabir ke dohe

{3}
ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय।
सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दै सोय ॥
kabir ke dohe
यदि कार्य उच्च कोटि के नहीं हैं तो उच्च कुल में जन्म लेने से क्या लाभ? सोने का कलश यदि सुरा से भरा है तो साधु उसकी निंदा ही करेंगे.

kabir dohe

 {4}
पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट ।
कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट॥
kabir dohe
ज्ञान से बड़ा प्रेम है बहुत ज्ञान हासिल करके यदि मनुष्य पत्थर सा कठोर हो जाए, ईंट जैसा निर्जीव हो जाए तो क्या पाया? यदि ज्ञान मनुष्य को रूखा और कठोर बनाता है तो ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं. जिस मानव मन को प्रेम  ने नहीं छुआ, वह प्रेम के अभाव में जड़ हो रहेगा. प्रेम की एक बूँद एक छींटा भर जड़ता को मिटाकर मनुष्य को सजीव बना देता है.

kabir das ji ke dohe

{5}
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय ।
जो घर देखा आपना मुझसे बुरा णा कोय॥
kabir das ji ke dohe
मैं इस संसार में बुरे व्यक्ति की खोज करने चला था लेकिन जब अपने घर अपने मन में झाँक कर देखा तो खुद से बुरा कोई न पाया अर्थात हम दूसरे की बुराई पर नजर रखते हैं पर अपने आप को नहीं निहारते !

kabir ke dohe hindi me

{6} 
झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह
झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह ॥
जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है तो दूना प्रेम बढ़ता है. पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है.

 kabir das ke dohe

{7}
करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय ।
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ॥
kabir das ke dohe
यदि तू अपने को कर्ता समझता था तो चुप क्यों बैठा रहा? और अब कर्म करके पश्चात्ताप  क्यों करता है? पेड़ तो बबूल का लगाया है फिर आम खाने को कहाँ से मिलें ?

 kabir das ke dohe

{8}
हिरदा भीतर आरसी मुख देखा नहीं जाई ।
मुख तो तौ परि देखिए जे मन की दुविधा जाई ॥
kabir das ke dohe
ह्रदय के अंदर ही दर्पण है परन्तु वासनाओं की मलिनता के कारण मुख का स्वरूप दिखाई ही नहीं देता मुख या अपना चेहरा या वास्तविक स्वरूप तो तभी दिखाई पड सकता  जब मन का संशय मिट जाए !

 dohe in hindi

{9}
मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास ।
मेरी पग का पैषणा मेरी  गल की पास ॥
sant kabir ke dohe
ममता और अहंकार में मत फंसो और बंधो यह मेरा है कि रट मत लगाओ ये विनाश के मूल हैं जड़ हैं कारण हैं ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है

 sant kabir ke dohe

{10}
तेरा संगी कोई नहीं सब स्वारथ बंधी लोइ ।
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ ॥
sant kabir ke dohe
तेरा साथी कोई भी नहीं है. सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात की प्रतीति भरोसा मन में उत्पन्न नहीं होता तब तक आत्मा के प्रति विशवास जाग्रत नहीं होता. अर्थात वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है जब संसार के सच को जान लेता है इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है तब ही अंतरात्मा की ओर उन्मुख होता है भीतर झांकता है !

sant kabir ke dohe

{11} 
हू तन तो सब बन भया करम भए कुहांडि ।
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि॥
sant kabir ke dohe
यह शरीर तो सब जंगल के समान है हमारे कर्म ही कुल्हाड़ी के समान हैं. इस प्रकार हम खुद अपने आपको काट रहे हैं यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं.
kabir ki vani 

 {12}
कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि ।
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि ॥
sant kabir ke dohe
यह शरीर लाख का बना  मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं.यह चार दिन का खिलौना है कल ही नष्ट हो जाएगा. शरीर नश्वर है जतन करके मेहनत  करके उसे सजाते हैं तब उसकी क्षण भंगुरता को भूल जाते हैं किन्तु सत्य तो इतना ही है कि देह किसी कच्चे खिलौने की तरह टूट फूट जाती है अचानक ऐसे कि हम जान भी नहीं पाते !

 kabir das ki amritvani

 {13}
बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत ।
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ॥
kabir das ki amritvani
रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत खा लिया. कुछ खेत अब भी बचा है यदि सावधान हो सकते हो तो हो जाओ उसे बचा लो ! जीवन में  असावधानी के कारण  इंसान बहुत कुछ गँवा देता है उसे खबर भी नहीं लगती नुक्सान हो चुका होता है यदि हम सावधानी बरतें तो कितने नुक्सान से बच सकते हैं !  इसलिए जागरूक होना है हर इंसान को -( जैसे पराली जलाने की सावधानी बरतते तो दिल्ली में भयंकर वायु प्रदूषण से बचते पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत |

 kabir das ki amritvani

{14}
जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि ।
जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि ॥
kabir das ki amritvani
जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे. जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण  कर उसे ही याद रख उसे ही संवार सुन्दर बना
 kabir das amritvani

{15} 
सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग ।
ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग ॥
kabir das ki amritvani
कबीर कहते हैं कि जिन घरों में सप्त स्वर गूंजते थे, पल पल उत्सव मनाए जाते थे, वे घर भी अब खाली पड़े हैं उनपर कौए बैठने लगे हैं. हमेशा एक सा समय तो नहीं रहता ! जहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है यह  इस संसार में होता है !

kabir ke dohe with meaning in hindi language 

 {16}
कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई।
नैनूं रमैया रमि रहा  दूजा कहाँ समाई ॥
kabir ke dohe with meaning in hindi language
कबीर  कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है वहां काजल नहीं दिया जा सकता. जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है ?

kabir ke dohe with meaning in hindi language 

{17}
इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव।
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव॥
kabir ke dohe with meaning in hindi language
इस शरीर को दीपक बना लूं, उसमें प्राणों की बत्ती डालूँ और रक्त से तेल की तरह सींचूं इस तरह दीपक जला कर मैं अपने प्रिय के मुख का दर्शन कब कर पाऊंगा? ईश्वर  से लौ लगाना उसे पाने की चाह करना उसकी भक्ति में तन-मन  को लगाना एक साधना है तपस्या है जिसे कोई कोई विरला ही कर पाता है !
kabir ke dohe with meaning in hindi language  

 {18}
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय।
kabir ke dohe with meaning in hindi language
गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हैं। पहले किसके चरण-स्पार्श करें। कबीरदास जी कहते हैं, पहले गुरु को प्रणाम करूंगा क्यों कि उन्हों ने ही गोविंद तक पहुंचने का मार्ग बताया है।
kabir ke dohe with meaning in hindi  

{19}
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।kabir ke dohe with meaning in hindi
बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
kabir ke dohe with meaning in hindi   

{20} 
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
kabir ke dohe with meaning in hindi
कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

dohe of kabir 


{21}  
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय
dohe of kabir
अगर हमारा मन शीतल है, तो इस संसार में हमारा कोई बैरी नहीं हो सकता। अगर अहंकार छोड़ दें तो हर कोई हम पर दया करने को तैयार हो जाता है।
dohe of kabir

 {22} 
साईं इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय
मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय
kabir das ke dohe
कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्माय तुम मुझे केवल इतना दो कि जिसमें मेरे गुजारा चल जाए। मैं भी भूखा न रहूं और अतिथि भी भूखे वापस न जाए।

kabir das ke dohe 

 {23} 
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई.
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ.
शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है। य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।
 kabir das ke dohe

 {24} 
माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर.
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर .
kabir das ke dohe
कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

kabir das ke dohe 


 {25} 
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही
जब मैं अपने अहंकार में डूबा था, तब प्रभु को न देख पाता था। लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया। ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।
kabir das ke dohe hindi 

 {26} 
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥
kabir das ke dohe
खजूर के पेड़ के समान बड़ा होने का क्या लाभ, जो ना ठीक से किसी को छाँव दे पाता है। और न ही उसके फल सुलभ होते हैं।


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